Wednesday, 20 July 2016

'हिन्दी सिनेमा के गीतों के मूल्यांकन का प्रश्न' पर केन्द्रित परिचर्चा


अपने एम.फिल. शोध कार्य के दौरान दो साक्षात्कारों के अलावा मैंने एक परिचर्चा भी तैयार की थी । कुछ बाध्यताओं के कारण यह परिचर्चा लघु शोध प्रबंध का हिस्सा नहीं बन सकी थी । यह परिचर्चा ‘परिवर्तन’ पत्रिका के जुलाई-सितम्बर' 2016 अंक में प्रकाशित हुई है, और अब इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से भी सार्वजनिक है । परिचर्चा में शामिल तीनों ही व्यक्ति हिन्दी फिल्म समीक्षा और आलोचना के जाने माने हस्ताक्षर हैं । इन सब ने समय निकाल कर इस परिचर्चा में हिस्सा लिया इसके लिए मैं आभार प्रकट करती हूँ ।
हिन्दी सिनेमा के गीतों के मूल्यांकन का सवाल हाशिये का सवाल रहा है । हिन्दी सिनेमा के गीत रचनात्मक, बहुआयामी, लोकप्रिय और प्रभावी होकर भी गंभीर चर्चाओं के दायरे में नहीं रहे हैं । हिन्दी की साहित्यिक आलोचना से तो ये चिर निर्वासित रहे हैं । क्या हिन्दी सिनेमा के गीतकारों का रचनात्मक अवदान कमतर है ? उनकी अभिव्यक्ति का संघर्ष कम महत्वपूर्ण है ? इस परिचर्चा में इस तरह के कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं को सम्बोधित करने की कोशिश की गयी है ।

सहभागी 

अरविन्द कुमार : जन्म -17 जनवरी 1930 ।  प्रथम संपादक के बतौर 1963 से 1978 तक अपने समय की चर्चित सिने पत्रिका माधुरी से सम्बद्ध रहे । उल्लेखनीय फिल्म पत्रकारिता के अलावा अनुवाद, सृजन व कोश निर्माण के लिए चर्चित । हिन्दी अकादमी, दिल्ली के सर्वोच्च सम्मान, शलाका सम्मान (2010-2011) से सम्मानित ।                                                                             सम्पर्क सी-18 चंद्रनगरग़ाजिबाद – 201011.
                                             ई-मेल - arvind@arvindlexicon.com

अजय ब्रह्मात्मज : जन्म - 30 अक्टूबर 1959 । लगभग ढाई दशकों से फिल्म आलोचना और फिल्म पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय और पर्याप्त प्रतिष्ठित । फिल्म समीक्षा के लिए ख्यात ब्लॉग चवन्नी चैप के संचालक ।
सम्पर्क : ई-मेल - abrahmatmaj@mbi.jagran.com                        brahmatmaj@gmail.com
शशांक दुबे : जन्म -13 अक्टूबर 1962 । चर्चित युवा फिल्म आलोचक । ‘पहल’ और ‘ज्ञानोदय’ सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन । व्यंग्य और अनुवाद विधा में भी दखल ।
सम्पर्क : 37/801एनआरआई कॉम्प्लेक्ससी-वुड्स एस्टेटनेरुलनवी मुंबई 400 706
 ई-मेल:  s.dubey@idbi.co.in



परिचर्चा
 हिन्दी सिनेमा के गीतों के मूल्यांकन का प्रश्न


1. हिंदी सिनेमा के गीतों का मूल्यांकन आप किस तरह करते हैं?

अरविंद कुमार : कभी हिंदी कविता छंदबद्ध होती थीफिर छंदहीन भी होने लगी । गीत और कविता में भी अंतर होने लगा । धीरे धीरे गीत लिखना निम्न श्रेणी की गतिविधि माना जाने लगा । कवि सम्मेलनों में केवल हँसोड़ों को जगह रह गईतो आम आदमी के लिए काव्यानुभूति का स्रोत फ़िल्म गीत ही बचे ।
फ़िल्म गीत कविता से बढ़ कर बहुत कुछ और भी होता है । उसमें कविता के साथ-साथ संगीत होता हैजिसे बड़ी मेहनत से और पूरे धन व जन बल से तैयार किया जाता है । आम तौर पर वे किसी घटना विशेष पर पात्रों के भावों को अभिव्यक्त करते हैं । जिस तरह चंपू काव्य होता थाउसी परंपरा में फ़िल्म गीत होता है । कई बार वह किसी सीक्वेंस में एकाधिक पात्रों के बीच संवाद होता । उसके बोल दृश्य के बदलते क्रियाकलाप (ऐक्शन) के हिसाब से लिखे जाते हैं । इस लिए छोटे से कलेवर में वह नन्हा सा एकांकी नाटक भी होता है । जैसे:  अच्छा तो हम चलते हैं / फिर कब मिलोगे / जब तुम कहोगे ।

अजय ब्रह्मात्मज फिल्‍मों में ध्‍वनि के आगमन के साथ गीतों की आवश्‍यकता महसूस की गई । इसका व्‍यापक प्रभाव और उपयोग दिखा । हिंदी फिल्‍मों के सफर में गीतों की गुणवत्‍ता समय के साथ बदलती रही है । एक दौर ऐसा भी आया जब गीत को संगीत ने ढँक दिया । अभी फिर से पांचवे-छठे दशक की तरह गीतों में प्रयोग हो रहे हैं । फिर भी यह स्‍वीकार करना होगा कि गीतों की साहित्यिकता कम हुई है ।

शशांक दुबे : हिन्दी सिनेमा की आत्मा गीतों में ही बसी है ।  जब दर्शक सिनेमा हॉल से फिल्म देखकर बाहर निकलता हैतब न तो उसे कहानी याद रहती है न संवाद । याद रह जाता है तो फिल्म का गीत-संगीत और यह गीत-संगीत महज उस तक ही सीमित नहीं रहताबल्कि रेडियोसीडी और अन्य माध्यमों के जरिये यह अगली पीढ़ी को भी अंतरित हो जाता है ।

2. सिनेमा से स्वतंत्र इन गीतों के महत्व पर आपकी क्या राय है?

अरविंद कुमार : फ़िल्म गीत का मर्म है, सीधी सच्ची बात । जितनी सीधी बात होगीउतनी ही दूर तक वह पहुँचेगी । अपनी आसान बोली में वे देश काल की सीमाएँ लाँघने में सक्षम होते हैं, तभी हमारा फ़िल्म संगीत संसार के हर कोने तकवहां भी जहाँ हिंदी जानने वाले नहीं हैंपसंद किया जाता है ।

अजय ब्रह्मात्मज सिनेमा भारतीय समाज का आधुनिकतम धर्म है । दर्शकों के अपने प्रिय गीत उन प्रिय भजनों की तरह हैंजिन्‍हें वे अपने आराध्‍य के लिए गाते हैं । फिल्‍मी गीतों ने लोकोक्ति और मुहावरों का भी रूप लिया है ।

शशांक दुबे : गीतों का सबसे बड़ा महत्व यह है कि सिनेमा से बाहर निकलकर भी ये हमारी पिकनिकोंउत्सवोंशादी-ब्याहों और पर्व-त्यौहारों में बारंबार सुने जाते हैं । इस प्रकार ये गीत हमारे अवचेतन का अनिवार्य हिस्सा बन जाते हैं ।

3. सिनेमा के गीतों ने जनता की अभिरूचि को विकसित परिवर्धित या परिवर्तित करने में कैसी भूमिका निभाई है?

अरविंद कुमार : सौभाग्यवश हिंदी फ़िल्मों को ढेर सारे समर्थ कवियों का सहयोग मिला । बहुत पहले अपने को महाकवि कहलाने वाले मधोककवि प्रदीपमजरूह सुल्तानपुरी,शकील बदायूँनीप्रेम धवनशैलेंद्रकैफ़ी आज़मीसाहिर लुधियानवीआनंद बख़्शी,गुलज़ारजावेद अख़्तर आदि… बहुत लंबी सूची है ।
ऐसे कवियों द्वारा लिखितकुशल संगीतकारों द्वारा स्वरबद्धप्रभावशाली आवाज़ों के धनी गायकों द्वारा उच्चरित और दसों रसों से सराबोर हिंदी फ़िल्म गीत दर्शकों को तृप्त करने में सफल होते रहे हैं । कुछ गीतों को छोड़ देंजिन में भौंडापन होता है (यह कुत्सितता तथाकथित साहित्यिक कविताओं में भी पाई जाती है )फ़िल्म गीतों ने जनरुचि को सँवारा ही है ।
एक ग़लतफ़हमी यह है कि सुरुचि केवल पढ़े लिखों या पंडित ज्ञानियों में ही होती है । हमारी अधिसंख्य आबादीचाहे वह दूरदराज़ के ग्रामीण होंशहरी मज़दूर होंया मध्यम वर्गीय सामान्य परिवार होंसब में सौंदर्य और भावुकता की एक आंतरिक भूख होती है । हो सकता है वे गहन साहित्यिक क्लिष्ट शब्दावली न जानते हों । भावुक अनुभूतियों के लिए शब्दचातुर्य की आवश्यकता होती भी नहीं है ।

अजय ब्रह्मात्मज यह व्यक्तियों के प्रभावग्रहण पर निर्भर है । हर व्‍यक्ति के दो-चार प्रिय गीत होते हैंजिन्‍हें वह अकेले होने पर गुनगुनाता है । गीतों से बौद्धिक विकास से बौद्धिक विलास तक होता रहा है ।

शशांक दुबे सिनेमाई गीतों ने हमारी भाषा को गहरे से प्रभावित किया है,  "मेरे यार शब्बा खैर" और "सायोनारा" से लगाकर "जय हो " और "मस्ती की पाठशाला" जैसे अनगिनत जुमले फिल्मी गीतों की ही देन  हैं ।

4. हिंदी सिनेमा सौ वर्षों का सफ़र पूरा कर चुका है. सिनेमा और सिनेमा के गीतों की विकासयात्रा को आप किस तरह से देखते हैं?

अरविंद कुमार : सिनेमा का सफ़र तो सौ साल का हुआ हैपर सवाक फ़िल्मों काटाकीज़ कासफ़र 1931 की आलम आरा से अब तक अस्सी ही पूरे कर पाया है । इंग्लिश की ही तरह पहली सवाक हिंदी फ़िल्म में गाने रखे गए थे ।

अजय ब्रह्मात्मज : गीत हमेशा फिल्‍मों की जरूरत पूरी करते रहे हैं । जैसी फिल्‍में,वैसे गीत । गीतों की यात्रा को फिल्‍मों की यात्रा से अलग नहीं किया जा सकता ।

शशांक दुबे इन सौ सालों में संगीत ने मेलोडी युग भी देखा है और डिस्को युग भीवाद्यों की संगत भी की है और इलेक्ट्रोनिक साज़ों का भी साथ निभाया है । हसरत साहब के शब्दों में कहें तो सिनेमा और संगीत के बीच का रिश्ता "सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था,आज भी है और कल भी रहेगा" वाला है ।  आज भी यह सिनेमा की सबसे बड़ी टेरिटरी है ।

5. हिंदी सिनेमा के पुराने गीतों और आज के सिनेमा के गीतों में बुनियादी अंतर क्या हैआप इसके क्या कारण मानते हैं?

अरविंद कुमार : पुराने गीतों में सादगी होती थी । मुझे बहुत पुराने ज़माने के कुछ गीत याद आ रहे है ।
‘तेरे पूजन को भगवानबना मंदिर आलीशान । तुम को मुबारक हों ऊँचे महल ये (कुछ ऐसी ही पंक्ति थी) हम को हैं प्यारी हमारी गलियाँहमारी गलियाँ’ । या सहगल के अमर गीत ‘इक बंगला बने न्यारा’‘दुख के दिन अब बीतत नाहीं’ । पंकज मलिक के – ‘पनघट पर कन्हैया आता हैआ के धूम मचाता है’ जैसे गीतों के मुक़ाबले आज के गीत पेचीदा होते जा रहे हैं । यह सब देश और समाज में आए बदलावों के अनुरूप हो रहा है । यह प्रक्रिया रोकी नहीं जा सकती । रोकनी भी नहीं चाहिए ।

अजय ब्रह्मात्मज : बुनियादी फर्क गीतकारों से आया है । पहले के गीतकार साहित्यिक और सांस्‍कृतिक रूप से अधिक संपन्‍न होते थे ।

शशांक दुबे पुराने गीतों में शब्दों और मूल वाद्यों पर ज़ोर होता थाआज इलेक्ट्रोनिक वाद्यों के हावी हो जाने का यह परिणाम है कि सरसरी तौर पर सुनते समय गीतों के शब्द पल्ले ही नहीं पड़ते । भाषा के प्रति उपेक्षा बोध और हर काम के पीछे जल्दबाज़ी की प्रवृत्ति ने गीतों को काफी नुकसान पहुंचाया  है । बावजूद इसके दस प्रतिशत ही सहीअच्छे गाने अब भी बन रहे हैं ।

6. क्या एक गीतकार के सृजनकर्म का संघर्ष सिनेमा के निर्माण से जुड़े अन्य प्रकार के सृजनकर्मों के संघर्ष से कमतर होता हैआप का किसी गीतकार या किन्हीँ गीतकारोँ के सृजनकर्म से व्यक्तिगत परिचय रहा हो तो कृपया बताएँ ।

अरविंद कुमार : सौभाग्यवश मुझे ढेर सारे फ़िल्म गीतकर्मियों से निकटतम संपर्क और परिचय का अवसर मिला । इंदीवरगुलज़ारजावेद अख़्तर । इंदीवर और गुलज़ार के प्रस्फुटन का तो मैं साक्षी रहा हूँ । लेकिन सब से निकट थे शैलेंद्र । वे जल्दी ही संसार से विदा हो गएइस लिए उनसे पारिवारिक घनिष्ठता कुल तीन साल चल पाई ।
लोग समझते हैं कि फ़िल्मी गीत लिखना बेहद आसान होता होगाऐसा है नहीं । फ़िल्म गीत रचना प्रक्रिया समझाए बग़ैर गीत लेखन की दुरूहता को समझा नहीं जा सकता । मैं एक उदाहरण देता हूँ । एक शाम अचानक मैं शैलेंद्र जी के घर पहुँच गया । उन दिनों गाइड के गीत बन रहे थे । उन्हें एक गीत की सिटिंग में जाना था । देव आनंद से अनुमति लेकर मुझे भी वे साथ ले गए । वहाँ निर्माता-अभिनेता देव आनंद थेनिर्देशक विजय आनंद थेसंगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन के सहायक की हैसियत से राहुल देव बर्मन थे । निर्माता-अभिनेता देव आनंद और निर्देशक विजय आनंद प्रस्तावित गीत के दृश्य का विवरण पहले ही दे चुके थे  - एक क़दम के बाद दूसरा क्या होगा नायक कहाँ होगानायिका कहाँउनके मनोभाव क्या होंगेवे क्या करेंगेसीनरी क्या होगी आदि । शैलेंद्र बोल पहले ही लिख कर दे चुके थे । अब उस का स्वरबद्ध कच्चा ख़ाका तैयार था । उस रात हारमोनियम पर बजा कर अपनी आवाज़ में गा कर सुनातेहम सब सुनते । मेरी भूमिका मूक दर्शक मात्र ही थीपर मेरे चेहरे की प्रतिक्रियाओं  पर भी उन की आँखें रहतीं । जो भी होयदि निर्माता-निर्देशक-गीतकार-संगीतकार चौकड़ी को वह पसंद आ जाता तो रिकार्ड कर लिया जातावरना फिर नए शब्द । यह क्रम चलता रहा जब तक बोल और धुन का लगभग पक्का ख़ाका तैयार नहीं हो गया ।

अजय ब्रह्मात्मज : गीतकारों का योगदान महत्‍वपूर्ण होता है । गीतकार की प्रतिभा का सदुपयोग फिल्‍मकार की योग्यता और पसंद से तय होता है । इन दिनों गीतकार फिल्‍मों के मनोभाव को शब्‍दों में व्‍यक्‍त करने से अधिक उसके मूल्‍यभाव बढ़ाने पर ध्‍यान देते हैं । उन पर कैच लाइन लिखने का दबाव रहता है,जो कॉलर ट्यून बन सके ।

शशांक दुबे : हमारे यहाँ नायकनायिकानिर्देशकसंगीतकार और गायक के मुक़ाबले गीतकार को यशधन और ग्लेमर कम ही मिल पाता है । संभवतः इसका कारण यह है कि सिनेमा के आर्थिक पक्ष से ऐसे लोग जुड़े हैंजिन्हें भाषा और संवेदना से कोई मतलब नहीं ।

7. हिंदी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्व को नकारा जाता रहा हैक्या इस विषय पर आप अपनी राय देना चाहेंगे?

अरविंद कुमार : साहित्यिक होने का मतलब दुरूह होना कतई नहीं है । मैंने आगे कुछ गीतों के उदाहरण दिये हैं । उन गीतों के बोल पढ़ने पर फ़िल्मी गीतों की साहित्यिकता अपने आप समझ में आ जाती है ।

अजय ब्रह्मात्मज : नकारने की बात तो तब की जाये कि जब उनपर कभी विचार किया गया होजब कभी उनकी चर्चा ही नहीं की गयी तो इनकार और स्वीकार की बात ही अलग हो जाती है । हिंदी साहित्य में सिनेमा को लेकर एक उदासीनता रही है और कहीं न कहीं साहित्य वाले जो शुद्धता प्रेमी लोग हैंउन्हें लगता है कि साहित्य जो रचा जा रहा है वही श्रेष्ठ होता है बाकी किसी और चीज़ में साहित्य नहीं होता । लेकिन अब समय आ गया है कि अब इनपर विचार किया जाए और इन गीतों के साहित्यिक महत्व पर बात की जाए चाहे साहित्य में एक अलग खंड बनाकर ही इनपर बात क्यों न हो । गीतों को साहित्‍य में जगह मिलनी चाहिए । कुछ गीत तो अपने समय के मनुष्‍य के संघर्ष और सुख की सशक्त अभिव्‍यक्ति हैं ।

शशांक दुबे यदि साहित्य का मतलब मात्र लेखकों द्वारा लिखी और उन्हीं की बिरादरी के द्वारा पढ़ी और सराही जानेवाली कहानियोंकविताओं और लेखों से हैतो फिल्मी गीत साहित्य नहीं हैं । लेकिन यदि साहित्य का मतलब ऐसी रचनात्मक विधा से हैजो मन-आँगन को झकझोर कर रख देतो फिल्मी गीत निश्चित ही साहित्य हैं ।

8. सिनेमा के कुछ गीतों पर आप यहाँ चर्चा करना चाहेंगे?

अरविंद कुमार : हिन्दी सिनेमा के गीतों का अथाह सागर है । मेरे प्रिय गीत बहुत सारे हैं । बानगी के लिए आवारा के शैलेंद्र रचित तीन गीतों का यहाँ उल्लेख करना चाहूँगा । पहला गीत है -
पतिवरता सीता माई को / तू ने दिया बनवास / क्यों न फटा धरती का कलेजा / क्यों न फटा आकाश / जुलुम सहे भारी जनक दुलारी / जनक दुलारी राम की प्यारी / फिरे मारी मारी जनक दुलारी / जुलुम सहे भारी जनक दुलारी / गगन महल का राजा देखो / कैसा खेल दिखाए / सीप का मोतीगंदे जल में / सुंदर कँवल खिलाए / अजब तेरी लीला है गिरधारी / जुलुम सहे भारी जनक दुलारी ।
सशक्त मर्मस्पर्शी फ़िल्मांकन और गीत के भाव दर्शकों की संवेदनाओं को सीधा छूते हैं । दिलों पर गहरी चोट करते और पीड़िता के प्रति उनकी सहानुभूति जगाते हैं । जो कुछ गीत में सीता के लिए कहा जा रहा है,वह सीधे राम पर चोट कर रहा है । उसे अन्याई क़रार दे रहा है । सच कहें तो यही गीत आवारा फ़िल्म का मर्म था ।
आवारा का दूसरा गीत- आवारा हूँ / गर्दिश में हूँ, आसमान का तारा हूँ / घरबार नहींसंसार नहींमुझ से किसी को प्यार नहीं/ उस पार किसी से मिलने का इकरार नहीं / सुनसान नगरअनजान डगर का प्यारा हूँ / आवारा हूँ ।
आवारा का मेरा तीसरा प्रिय गीत है  तेरे बिना - आग - ये चाँदनीतू आजा / तेरे बिना - बेसुरी बाँसरीये मेरी ज़िंदगी - दर्द की रागिनी / तू आजातू आजा ।
अंत में श्री चार सौ बीस के एक गीत का उल्लेख करना चाहूँगायह गीत उभरते भारत का प्रतीक बन गया था- मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी / सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी ।

अजय ब्रह्मात्मज अनेक गीत हैं,जो मेरी मानसिक दशाओं को समय-समय पर अभिव्‍यक्‍त करते रहे हैं । मुगले-आज़म’ के गीतपुरानी देवदास’ के गीत मुझे बेहद पसंद हैं । एक समय में फिल्मों की कव्वालियां बहुत पसंद थीं, जिनकी परंपरा ही आज खो गयी है । हाल की फिल्मों में थ्री इडियट्स’ का बहती हवा सा था वो” या हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी’ काबावरा मन देखने चला इक सपना” आदि गीत अच्छे लगते हैं ।

शशांक दुबे : जब तक हमें "चल उड़ जा रे पंछी के अब ये देस हुआ बेगाना", "राही मनवा दुख की चिंता क्यूँ सताती हैदुख तो अपना साथी है", "किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार", "संसार से भागे फिरते होभगवान को तुम क्या पाओगे", "तुम गगन के चंद्रमा हो,मैं धरा की धूल हूँ", "कुछ तो लोग कहेंगेलोगों का काम है कहना", "गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होतामौसम-ए-गुल को हँसाना भी हमारा काम होता ", "खिलते हैं गुल यहाँखिलके बिखरने को", "कल तो सब थे कारवां के साथ-साथआज कोई राह दिखलाता नहींकोई सागर दिल को बहलाता नहीं", "तेरी ज़ुल्फों से जुदाई तो नहीं मांगी थीक़ैद मांगी थी रिहाई तो नहीं मांगी थी"  जैसे गीत सुनने को मिलते रहेंगेहमारा मन-आँगन महकता रहेगा ।

प्रस्तुति : प्रियंका

[*अप्रैल-मई 2014 में सभी सहभागियों से ईमेल द्वारा प्राप्त प्रश्नोत्त्तर पर आधारित ]

हिंदी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्व पर केन्द्रित दो साक्षात्कार


मैनेजर पांडेय और अजित कुमार से प्रियंका की बातचीत

हिन्दी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक मूल्यांकन का सवाल हाशिये का सवाल रहा है । हिन्दी सिनेमा के गीत रचनात्मकबहुआयामीलोकप्रिय और प्रभावी होकर भी साहित्यिक आलोचना से निर्वासित रहे हैं । ‘हिंदी सिनेमा के गीतों का साहित्यिक महत्व’ विषय पर शोध कार्य करते हुएमेरे सामने एक बड़ी चुनौतीइस विषय पर हिन्दी आलोचकों की वैचारिक अनुपस्थिति से निपटने की थी । कुछ एक अपवादों को छोड़करहिन्दी आलोचकों ने हमेशा से हिंदी सिनेमा के गीतों को गंभीर चर्चा का विषय मानना तो दूर उल्लेख मात्र के योग्य भी नहीं समझा है ।
मैंने अपने शोध कार्य (2013-2014) के दौरान कुछ आलोचकों से सम्पर्क करने की कोशिश की थी । मुझे अच्छी तरह याद है कि हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि आलोचक अशोक वाजपेयी ने बिना झिझकइस विषय में अपनी अरूचि और शास्त्रीय संगीत के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुएसाक्षात्कार देने से मना कर दिया था । मैनेजर पाण्डेय और अजित कुमार ने ऐसी ही नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी थीइसलिए उनसे बातचीत कर पाना संभव हो सका था ।
वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पाण्डेय कविता के मर्मज्ञ रहे हैं । भक्तिकालीन कवियों पर इनका काम महत्वपूर्ण माना जाता है । अजित कुमार कवि होने के साथ-साथ कविताओं के संकलन- संपादन और आलोचना से भी सम्बद्ध रहे हैं । प्रस्तुत साक्षात्कारों के माध्यम से हिन्दी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्त्व पर इन दोनों आलोचकों के विचारों की मुखर अभिव्यक्ति  हुई है । मैंने अपने शोध कार्य में शैलेन्द्र के गीतों का विशेष संदर्भ लिया थाइसलिए साक्षात्कार के कुछ सवाल शैलेन्द्र के रचना कर्म पर एकाग्र हैं । वास्तव में शैलेन्द्र एक उदाहरण मात्र हैंं, उनकी जगह निस्संकोच हसरत, साहिर, कैफी, प्रदीप, नीरज, गुलजार या जनमानस में बसे किसी अन्य गीतकार को रखा जा सकता है ।
प्रस्तुत साक्षात्कारों में व्यक्त विचार आलोचना से परे नहीं हैं । इन पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण से विचार करने की भरपूर संभावनाएँ हैंलेकिन इन आलोचकों के द्वारा हिन्दी सिनेमा के गीतों के संदर्भ में व्यक्त विचारों का हिन्दी सिनेमा के गीतों से सम्बद्ध आगामी शोधकार्यों के लिए ‘दस्तावेज़ी महत्त्व’ असंदिग्ध है ।


साक्षात्कार-1

हिन्दी सिनेमा और साहित्य के बीच गंभीर सम्बन्ध कभी विकसित ही नहीं हुआ
मैनेजर पाण्डेय से बातचीत*


सिनेमा और सिनेमा के गीतों के विषय में आपकी क्या राय है ?
बारीक बात बाद में । मुझसे एक बार फ़िल्मीं जगत के अनुभव सुना रहे थे कमलेश्वरतो मैंने पूछा कि अब आपने फ़िल्मों के लिए लिखना छोड़ा क्यूँ तो कमलेश्वर बोले कि जब तक मैं उसमें अपने को सहज महसूस करता था तब तक तो रहना ठीक लगा लेकिन अब... उन्होंने कहा कि गीत से लेकर संवाद तक डायरेक्टर मुझसे कहते थे कि कोई ऐसी सिचुएशन क्रिएट कीजिये जिसमें कि हीरोइन को कमर लचकाने का मौका होतो उन्होंने कहा कि मैंने छोड़ दियाये मुझसे नहीं होगा । ये तो हो गयी मोटी बातअब बारीक़ बात- मैं यह कहता हूँ कि फ़िल्मी गीत लिखने की प्रक्रिया में डायरेक्टर का हाथ अधिक रहता है । ऐसे कम गीतकार हैं, जैसे कैफ़ी आज़मी थेसाहिर लुधियानवी थेशैलेन्द्र थे वगैरह-वगैरह जो कि तीन स्थितियों से गुजरने के बाद गीत लिखते थे- पहला- कहानी सुनते थे और तब तय करते थे कि हम इसमें रहेंगे या नहीं रहेंगे । अब मान लो की कहानी ही दो कौड़ी की हो तो उसमें कोई गीत या संवाद क्या लिखेगा ! दूसरा- सिचुएशन को देखते थेकि फ़िल्म में दृश्य क्या हैउसके अनुसार अगर स्वीकार कर लिया तो गीत लिखते थे । तीसरी बात ये है कि गीतों के दो स्रोत हैं – एक देशभर की हर मातृभाषा में लोकगीत होते हैं जितने भी गंभीर लेखक और सीरियस गीतकार हैं वो उन लोकगीतों की मदद से अपने गीत रचते थे जो की शैलेन्द्र के यहाँ बहुत है । ध्यान देने की बात ये भी है कि शैलेन्द्र पहले इप्टा में थेरेलवे में एम्प्लॉय भी थे । तो इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े होने के कारण उनका एक प्रगतिशील दृष्टिकोण था । ये उनकी कविताओं से साबित होता है और गीतों से भी साबित होता है । शैलेन्द्र दो स्रोतों से अपने गीतों की रचना की सामग्री जुटाते थे- एक लोकजीवनलोकचेतना और लोकगीत । दूसरा सोच विचार की प्रक्रिया सेजीवन जगत के बारे में अपने अनुभव से । इससे उनके गीतों का स्वरुप बनता था । अब यह तो हर फ़िल्मी गीतकार की मजबूरी है और उसका गुण भी कि गीत ऐसा लिखे जो सहज हो । शैलेन्द्र तो कवितायें भी वैसी ही लिखते थेइसलिए कवि शैलेन्द्र और गीतकार शैलेन्द्र में बुनियादी एकता  है ।

कवि और गीतकार शैलेन्द्र को साहित्य में तो फिर भी कभी पहचान नहीं मिल पाई जबकि उन्होंने गीत भी वैसे ही लिखे जैसी कि वे कवितायें लिखते थे ।
शैलेन्द्र के कुछ गीत ऐसे भी हैं जो उनके पहले के गीत हैं वो फ़िल्मों के लिए नहीं लिखे थे उन्होंनेजैसे – ‘तू जिंदा है तो ज़िन्दगी की जीत में  यकीन कर’ ये गीत बहुत पहले का हैबाद में किसी फ़िल्म में फिट किया गया है ।

जब तक वे प्रलेस में थेइप्टा से जुड़े हुए थे तब तक सहित्य में उन्हें जाना गयाजैसे ही उन्होंने सिनेमा के लिए गीत लिखना शुरू किया साहित्य जगत से वे अलग-थलग क्यों कर दिये गये ? उनके इन गीतों को साहित्यिक महत्त्व का क्यों नहीं माना गया ? 
कवि के रूप में भी मेरी जानकारी में शैलन्द्र पर किसी आलोचक ने लेख तो छोड़ो उनका उल्लेख तक नहीं किया । ये अलग बात है कि जब वे इप्टा में थे तो उनके गीत सम्मेलनों में गाए जाते थे । फिर उनका एक संग्रह भी छपा ‘न्यौता और चुनौतियाँ’ नाम सेलेकिन फ़िल्मीं गीतों के साथ दिक्कत ये है कि हिंदुस्तान में साहित्य और सिनेमा के बीच गंभीर सम्बन्ध कभी विकसित ही नहीं हुआ उदाहरण के लिए मुझे दो भाषाओं की फ़िल्मों का थोड़ा ज्ञान है हिंदी के आलावा,बंगला और मलयालम का । बंगला में फिल्म वाले जो लोग थेवे स्वयं साहित्यकार थे और साहित्य में उनकी चर्चा कई तरह से होती हैयही स्थिति थोड़ी-थोड़ी मलायलम फ़िल्मों में भी है लेकिन हिंदी में यह प्रवृति नहीं है । मूल बात ये है कि हिंदी में फ़िल्मों और साहित्य के बीच गंभीर संवाद और सम्बन्ध की स्थिति कभी बनी ही नहीं । तो उसका परिणाम यह हुआ कि जो फ़िल्मों के लिए गीत लिखते थे उनको साहित्य वाले महत्त्व नहीं देते थेउनकी चर्चा भी नहीं करते थे और जो गीतकार थे फिर वे भी धीरे-धीरे साहित्य की दुनिया से कटने लगे । शैलेन्द्र भी इस प्रक्रिया का शिकार हुए क्योंकि यह एक व्यापक प्रक्रिया फिल्म और साहित्य के बीच सम्बन्ध के आभाव की है । उसके शिकार वे भी हुएसाहिर लुधियानवी भी हुएमजरूह सुल्तानपुरी भी हुए और बहुत सारे लोग हुए ।

आप सिनेमा के गीत सुनते हैं ? ऐसे कुछ गीत जो आपको पसंद हों ?
गीत अलग से तो मैं नहीं सुनता लेकिन जो फ़िल्में देखी हैं उनमें जो गीत सुने हैं वह भी तो गीत सुनना ही हुआ ना । ‘सजनवा बैरी हो गए हमार’ यह गीत है शैलेन्द्र का इस गीत को पढ़कर ही लगता है कि जैसे कबीर का गीत हो ‘चिठिया हो तो हर कोई बाँचे हाल ना बाँचे कोय’ ये लगभग उसी अंदाज़ का गीत है जो कबीर का है मीरा का है । ‘तू जिंदा है तो ज़िन्दगी की जीत पर यकीन कर’ अब यह मजदूर संगठन का गीत हैज़िन्दगी के संघर्ष में उम्मीद जगाने वाला गीत है । कौन कवि किधर से शब्दावलीभाषाप्रेरणा लेता है इससे भी गीतों का साहित्यिक महत्त्व बनता है । अच्छाऐसे भी गीत हैं जो फिल्म में अच्छे लगे लेकिन बाहर वो उतने अच्छे नहीं लगे । माने टेक्स्ट के रूप में । “प्यासा” फ़िल्म का एक गीत है -  ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं’ । यह गीत जब फिल्माया गया तब तो बहुत प्रभावशाली हैलेकिन अलग से यह गीत लेकर पाठ के रूप में पढ़ें तो वो उतना महत्त्वपूर्ण नहीं लगेगा । इसलिए गीत की साहित्यिकता तय करते हुए यह ध्यान में रखना होगा कि संगीत के साथ होने पर उसकी साहित्यिकता ज्यादा महत्त्वपूर्ण है या संगीत और दृश्य के साथ । कभी-कभी फ़िल्मी गीतों को महत्त्वपूर्ण बनाने में संगीतकारों का भी बहुत महत्त्व रहा जैसे खय्याम हैंनौशाद हैं ।

आपको नहीं लगता की साहित्य में इन सिनेमा के गीतों पर भी चर्चा होनी चाहिए ?                   
बिलकुल होनी चाहिए । क्यों नहीं होनी चाहिए !

तो क्यों नहीं हुई या होती  ?
अब क्यों नहीं होती ये तो वही जाने जो नहीं करते !

आपको नहीं लगता की आलोचकों को इस और ध्यान देना चाहिए ?
ओह हो! मैंने तो कहा न तुमसे कि शैलेन्द्र का तो लोग उल्लेख तक नहीं करतेमैंने तो लेख लिखा है उनपर । तो अब मैं क्या कह सकता हूँ !

भाषा के स्तर पर हिंदी को समृद्ध करने का कामदेशों-विदेशीं तक पहुचांने का काम हिंदी सिनेमा के गीतों ने किया आपकी क्या राय है ?
ये कोई साहित्यिक महत्त्व नहींयह भाषा के स्तर पर है इससे साहित्य का कोई प्रतिमान या आधार तो नहीं बनेगा ! इंग्लिश स्पीकिंग एरिया में भी हिंदी को पहुँचाने का काम फ़िल्मीं गीतों ने किया है तो ये भाषा के स्तर पर उनका योगदान हैपर साहित्यिक मामला यह नहीं है ।

जिस प्रकार कविताओं की आलोचनाएँ या चर्चाएँ होती हैंउसी प्रकार गीतों पर भी चर्चा हो तो आपको नहीं लगता कि उनका स्तर और अधिक सुधर सकता है ?
किसी भी चर्चा से गीतों का स्तर सुधर नहीं सकताक्योंकि वो सारा व्यवसाय का मामला है । गीतकार निर्देशक के जब इस इशारे पर गीत लिखेगा की एक्ट्रेस नाचे- कूदे ,कमर लचकाए तो गीतकार भी ऐसे ही गीत लिखेगा ना । क्योंकि उसको पैसा मिलना है । फ़िल्म का सारा माध्यम एक भारी व्यवसाय है । व्यावसायिकता ने घुसकर हर चीज़ को नष्ट किया है । सिनेमा के गीतों पर ऐसा नहीं है कि तुम पहली हो जो काम कर रही होइससे पहले भी विभिन्न विश्वविद्यालयों में फ़िल्मीं गीतों पर काम हुआ है । थोडा काम तो हुआ है लेकिन चूँकि साहित्य में इसकी चर्चा नहीं होतीपत्र-पत्रिकाओं में नहीं होतीआलोचनाओं में नहीं होती तो तुम थीसिस लिखोगी और उसके दो ही हश्र हो सकते हैं- या तो पड़ी रहे लाइब्रेरी में और तुम्हारे पास होनहीं तो छप जाये और दो चार मित्र लोग पढ़ लें । इसलिए खाली रिसर्च से वो संवाद नहीं बन पातानहीं तो रिसर्च तो बहुत लोगों ने किया है ।

पुराने गीतों और नए गीतों में कोई बुनियादी अंतर जो आपको लगता  हो ?
आज के निन्यानवे प्रतिशत गीत रद्दी हैं । पुराने गीत-संगीतफ़िल्म तक सामाजिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर लिखे जाते थे आज तो कुछ भी नहीं है । हाल के वर्षों में अधिकांश फ़िल्में देखना मैंने बंद कर दिया है । पुरानी फ़िल्में हर दृष्टि से बेहतर हैं गीतों की दृष्टि सेलिखने वालों की दृष्टि सेसंगीत की दृष्टि से । आज तो संगीत के नाम पर म्यूजिक कम और शोर ज्यादा है । 
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*तिथि-  23 फरवरी 2014 / स्थान- नयी दिल्ली 


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साक्षात्कार-2

साहित्य के प्रति शुद्धतावादी दृष्टिकोण सिनेमा के गीतों की साहित्यिक उपेक्षा का कारण है
अजित कुमार से बातचीत**



अजित कुमार को फोन पर मैंने अपने शोध विषय के बारे में बताया था । उनसे मिलने पर अनौपचारिक संवाद के बाद, बातचीत पहले उन्होंने ही शुरू की ।
जो चीज़े हमारी चेतना में नयी-नयी जुड़ती जाती हैं उनको हम अपनी संवेदना से सम्बद्ध करें वो सम्बद्ध करना ही हमें एक नयी दृष्टि दे सकता है । ऐसा तो नहीं है कि जो हम चार हज़ार साल पहले थे आज भी वैसे ही हैं, इस बीच में दुनिया बहुत बदली है और बहुत सी नयी चीज़े आ गयीं हैं । अगर हम किसी चीज़ को यही करते रहेंगे कि जो पुराना है उसी के आलोक में हम सबकुछ देखें तो हमारा दृष्टिकोण और चीज़ों की समझ-बूझ सीमित हो जाएगी। नयी-नयी चीज़े जैसे मान लो कि एडवरटाइज़मेंट है वो क्यों नहीं हमारी साहित्यिक संवेदना को और अधिक समृद्ध कर सकता ? मेरा सवाल ये है कि हम चीज़ों को एक्सक्लूड (exclude) करें या चीज़ों को इनक्लूड (include) करें, ये दो दृष्टिकोण हैं । मेरा दृष्टिकोण इसमें ये है कि जो नयी-नयी चीज़ें आ रही हैं उनको हम शामिल करते जाएं और अपनी चेतना के अंतर्बोध के धरातल का हम विस्तार करें और उसमें कविता को लायें । मान लो जैसे रघुवीर सहाय की कविता है- “निर्धन जनता का शोषण है कहकर आप हंसे / चारों और बड़ी लाचारी कहकर आप हंसे / कितने आप अकेले होंगे मैं सोचने लगा / तभी मुझको अकेला पाकर फिर से आप हंसे ।”
ये राजनेताओं पर व्यंग है, कटाक्ष है लेकिन मैं समझता हूँ कि यह कविता की संभावनाओं को बढ़ाता है बजाय इसके कि हम यह कहें कि यह पत्रकारिता है और पत्रकारिता को हम घटिया दर्जे की चीज़ माने और साहित्यिकता को हम विशेष दर्जे में रखें । यह भी एक दृष्टिकोण है पुराने पंडितों का जो आचार्य लोग हैं, उनका यही दृष्टिकोण है कि चीज़ें अपनी शुद्धता में रहें । लेकिन अगर आप देखें तो शुद्धता की परिकल्पना एक कल्पना मात्र है । हजारी प्रसाद द्विवेदी को अगर आप पढ़ें तो वो कहते हैं कि सबकुछ मिश्रण है । खासकर हिंदुस्तान जैसे देश में जिसमें कि विभिन्न जातियां आयीं सबका मिश्रण हुआ और यह अकारण नहीं कहा जाता की यहाँ यूनिटी इन डाइवर्सिटी (unity in diversity) यानि अनेकता में एकता है । तो अगर हम अनेकता में एकता के विचार को स्वीकार करते हैं तो साहित्य के सन्दर्भ में भी हमें उस अनेकता के विचार को शामिल करना चाहिए मेरा विचार यही है ।

सिनेमा के गीतों को आप किस नज़र से देखते हैं ? और क्या साहित्य में इनपर विचार होना चाहिए ?
मैंने तो हमेशा इनका स्वागत किया है, बस ये है कि उनका कुछ अभिप्राय होना चाहिए ।

सिनेमा के कुछ गीत जो आपको पसंद हों ?
पुराने ज़माने के तमाम गीतों को हमने पसंद किया है जैसे ये गीत है ‘सुनो छोटी सी गुड़िया की लम्बी कहानी’ यह गीत मुझे बेहद पसंद है । ‘तीसरी कसम’ के तमाम गीत मुझे बहुत पसंद हैं खासकर ‘सजनवा बैरी हो गए हमार’ और ‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया’, या एक और गीत है- ‘गंगा आये कहाँ से गंगा जाये कहाँ रे’ यह बहुत सुन्दर गीत है ।

सिनेमा के गीतों का जनमानस पर कैसा प्रभाव रहा है ?
 दुबई में मैं एक प्रोग्राम में गया था वहां रह रहे भारतीय एक ग्रुप चलाते हैं, जिसमें  कि आये दिन वे लोग कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं और उस कार्यक्रम में हिंदी फ़िल्मों के गीत सुने और गाये जाते हैं । वहां मैंने जाना कि पूरे दुबई का एक पढ़ा-लिखा वर्ग फ़िल्मीं गीतों के माध्यम से अपनी भारतीय संस्कृति को बचाए हुए है और अपनी आइडेंटिटी ( Identity) को कायम रखे हुए है । और यही बात अमरीका में भी देखी जा सकती है । तो इंडिया अवे फ्राम इंडिया, होम अवे फ्राम होम(India away from india, Home away from home) ये जो एक बात है इसको बनाये रखने में हिंदी के फ़िल्मी गीतों ने बहुत बड़ी भूमिका निभायी है । रूस में जाओ, तुर्की में जाओ सब जगह यही मिलता है । राजकपूर का तो मशहूर ही है कि ‘मेरा जूता है जापानी’ रूस में उनकी विशिष्ट पहचान बन गया था ।

आपको यदि कहा जाये कि सिनेमा के गीतों पर आपको आलोचना लिखनी है या लेख लिखना है तो आप कौन से गीतों, गीतकारों को शामिल करेंगे ?
एक तो मैं लिख ही नहीं पाऊंगा इस विषय पर लेकिन फ़िल्में देखना, गीत सुनना मुझे बेहद पसंद रहा है । ऑफलाइन अभी मैं कोई कमेंट नहीं कर सकता बाद में सोचकर जरुर करूँगा क्योंकि मेरा दृष्टिकोण यही है कि इन्हें  एक्सप्लोर (Explore) करना चाहिए । मैंने बहुत एन्जॉय किया फ़िल्मीं गीतों को और मेरा मानना है कि इनका बहुत सामाजिक महत्त्व है, शैक्षिक महत्त्व है और सबसे बड़ी बात है कि भाषा शिक्षण में फ़िल्मीं गीतों से उपयोगी कोई और विधा नहीं रही ।

आपकी नज़र में इसके क्या कारण रहे कि सिनेमा के गीतों और गीतकारों को साहित्य में उपेक्षा की दृष्टि से ही देखा गया ?
साहित्य के प्रति शुद्धतावादी दृष्टिकोण रखने वाले लोगों के कारण ही ऐसा हुआ । अब तुम काम कर रही हो चुनौती को स्वीकार किया अच्छा है, भले ही थोड़ा कन्ट्रोवर्शियल (controversial) हो जाये लेकिन काम सेटिसफेक्ट्री (satisfactory) होना चाहिए और हो सकता है इससे कुछ परिवर्तन आये और हिंदी में रिसर्च को लेकर जो धारणा है कि दस किताबों को मिलाकर एक ग्यारहवीं किताब बना दी जाती है उसी को हिंदी में रिसर्च कहते हैं यह धारणा भी टूट सके । तुम्हें इसपर चर्चा के लिए मंच तैयार करना  है ।

हिंदी कविता के ऐसे कौन से तत्त्व हैं जो सिनेमा के गीतों में नहीं दिखाई पड़ते ?
हिंदी कविताओं में अमूर्तन हैअसपष्टता हैगूढ़ता है जैसे जो शमशेर की कविताओं में है मुक्तिबोध की कविताओं में है वो हिंदी के गीतों में नहीं आ पाई । हिंदी के तमाम कठिन कवियों में अस्पष्टतागूढ़ताएक विशेष प्रकार की रहस्यमयता है कि शब्द सब समझ में आ रहे हैं लेकिन अर्थ स्पष्ट नहीं हो रहा ये विशेष प्रकार की चीज़ है जो हिंदी फिल्मीं गीतों में नहीं आ पाई है ।

किसी कृति के महत्त्व को स्थापित करने के लिए साहित्य के ऐसे कौन से ऐसे मानदंड हैं जिनका हमें प्रयोग करना चाहिए ?
इसके लिए बहुत से मानदंड हैं जैसे कि जो हमारे शास्त्रीय सिद्धांत हैं उनकी कसौटी पर कविता कितनी खरी उतरती हैरस की कसौटी हैअलंकार की कसौटी है एक ये मानदंड है दूसरा कि भाषिक शुद्धता उनमें कितनी हैएक ये है कि मार्मिकता कितनी हैअनुभूति की सच्चाई कितनी है यानि कि अनुभूति की प्रमाणिकता उनमें है या नहींसमाज से सम्बद्धता कितनी है अपने समय की राजनीति के प्रति कितनी समझदारी है ये तमाम मानदंड हैं उसमें आपके अंतर्मन में देखे हुए स्वप्नों की कितनी अभिव्यक्ति हुई हैआपकी कविता में आपके भीतर का रहस्य कितना अनावृत हुआ एक ये कसौटी हैकितनी मार्मिक चेतना हैकितनी संवेदनशीलता है, कितनी साझेदारी आप कर सकते हैंतादात्म्य कितना स्थापित कर सकते हैंदूसरे लोगों के साथ कितना जुड़ाव उसका हो सकता हैकितना वो आपको छूती है यही सब बहुत से मानदंड हैं अलग-अलग समय में अलग-अलग मानदंड बनाये गए और वो सारे मानदंड प्रासंगिक हो सकते हैं कभी किसी लिए कुछ कभी किसी के लिए कुछ । एक युग में एक मानदंड होता है दूसरे युग में दूसरा । ये एक तरीके का रसायन जो कई सारे मिश्रणों से मिलकर बना है और अब नए युग में भी निरंतर समय के बदलाव के साथ-साथ नए-नए मानदंड विकसित हो रहे हैं ।
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** तिथि-  26 फरवरी 2014 / स्थान- नयी दिल्ली