नील माधब पांडा की फिल्मों मे पर्यावरण की चिंता कहीं न कहीं ज़रूर मौजूद रहती है। 'कड़वी हवा' में पर्यावरण के बदलते स्वरूप के दुष्प्रभावों को दिखाया गया है। लेकिन इसके अलावा इसके और भी कई आयाम हैं। मसलन कृषि संकट और कर्ज में डूबे किसानों की समस्या दिखाई गयी है, सरकारी उदासीनता और भारी असंवेदनशीलता दिखाई गयी है। गरीबी और लाचारी दिखाई गयी है।
फिल्म दो घंटे से भी कम समय की है। धीमी गति से चलती है। जिस मोड़ पर आकर यह लगने लगता है कि असली कहानी अब शुरू होगी, ऐसे मोड़ पर आकर फिल्म खत्म हो जाती है। यह फिल्म आपको समझाने के बजाय आपकी समझ पर अधिक यकीन करती है। सहजता से चलने वाली यह फिल्म भी एक जटिल कविता की तरह खत्म हो जाती है, जिसके अनेक अर्थ आपको तलाशने होते हैं।
मेरी जानकारी में पूरे हैदराबाद में सिर्फ एक पीवीआर मल्टिप्लैक्स ने दिनभर में सिर्फ एक शो इस फिल्म के लिए रखा है। फिर भी दर्शक बहुत संख्या में नहीं जुट रहे हैं। पहले दिन के शो में लगभग डेढ़ सौ की क्षमता वाले हाॅल में मुझे मिलाकर मात्र आठ लोग ही थे। शायद वीकेंड पर लोग घरों से निकलें।
फिल्म की चिंता ईमानदार है। केन्द्रीय भूमिका निभा रहे संजय मिश्रा और रणवीर शौरी का अभिनय पसंद करने लायक है। फिल्म और अधिक संप्रेषणीय और अधिक प्रभावी बनायी जा सकती थी, लेकिन जैसी भी बनी है, सराहने लायक है। फिल्मकार व्यावसायिक फायदे के लिए अपने उद्देश्यों से समझौते नहीं करे, बेईमानी न करे, हमारे समय में फिल्म के दर्शको के लिए इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा!
मौका मिले तो हाॅल में जाकर ऐसी फिल्म को इसलिए भी देखिए कि फिल्मकारों में ऐसी फिल्में बनाने का हौसला बचा रहे।