'इंदु सरकार' देखकर लौटते हुए ऐसा नहीं लगा कि खाली हाथ लौट रही हूं। मेरे खयाल से इमरजेंसी के हालात को केन्द्र में रखकर बनाई गई किसी भी फिल्म को देखकर इमरजेंसी के बाद जन्मी या होश संभालने वाली पीढ़ी को शायद यही एहसास होगा। लेकिन इस फिल्म में भारी अधूरापन और राजनीतिक लोचा है। यह कहना दुखद है कि मधुर भंडारकर अब निष्ठावान फिल्मकार नहीं रहे। संभव हुआ तो इस पर बाद में विस्तार से लिखने की कोशिश करूंगी।
Friday, 28 July 2017
Friday, 21 July 2017
लिपस्टिक अंडर माय बुर्का
‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्क़ा’ देख कर लौटी हूँ। एक वाक्य में कहें तो यह स्वाभाविक इच्छाओं, सपनों और आज़ादी के अनावश्यक दमन या इन पर ग़ैर ज़रूरी बंदिशों, पाबंदियों के नकारात्मक परिणामों पर केन्द्रित फ़िल्म है। इसका शीर्षक एक रूपक (Metaphor) है, जो फिल्म की विषय-वस्तु के आधार पर सार्थक है।
इस फिल्म को अच्छी कहने के बावज़ूद, मैं बहुत प्रभावशाली नहीं कहूँगी। फिर भी अर्थपूर्ण सिनेमा की खोज़ में रहने वाले दर्शकों को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए। यह फिल्म एक ज़रूरी संदेश देती है, लेकिन इसे ग्रहण करने के लिए इस लायक संवेदनशीलता की ज़रूरत पड़ेगी। फ़िल्म का अभिनय पक्ष प्रशंसनीय है।
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