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| हसरत और शैलेन्द्र |
Tuesday, 15 March 2016
क्या मेरे मन में समाई !!
पुत्र का पिता हो जाना
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शैलेन्द्र और उनके पुत्र शैली शैलेन्द्र
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शैलेन्द्र के अकस्मात चले जाने के बाद ‘मेरा नाम जोकर’ का वह गीत अधूरा रह गया । ‘जीना यहाँ मरना यहाँ’ का सिर्फ मुखड़ा तैयार हो सका था । बीमार शैलेन्द्र ने राज कपूर से कहा कि अस्पताल से लौट कर वह गीत पूरा कर देंगे । शैलेन्द्र के यूँ चले जाने से वह एक गीत ही नहीं उनका वादा भी अधूरा रह गया । यह बहुत कम लोग जानते हैं कि अब जो गीत पूरा का पूरा हमारे सामने है, उसका अंतरा शैलेन्द्र ने नहीं लिखा है ।
शैलेन्द्र की पत्नी शकुंतला ने एक घटना का जिक्र किया है । उनके बड़े बेटे शैली तब छुटपन में थे । अपनी माँ को रसोई में मेहनत करते हुए देखकर शैली ने कहा कि हम रोटियों का पेड़ क्यों नहीं लगा लेते ? माँ के लिए बेटे की संवेदनशीलता को इस वाक्य में महसूस किया जा सकता है । शैलेन्द्र ने शैली की इस मासूम जिज्ञासा से प्रेरणा लेकर तब एक गीत लिखा था । फिल्म मुसाफिर (1957) के ‘मुन्ना बड़ा प्यारा’ गीत की पंक्तियाँ ‘एक दिन वो माँ से बोला / क्यूँ फूँकती तू चूल्हा / क्यूँ न रोटियों का पेड़ एक लगा लें / आम तोड़े रोटी तोड़ें / रोटी आम खा लें’ कहा जा सकता है कि शैलेन्द्र ने शैली से ही उधार ली हैं ।
अधूरे गीत से अधिक जरूरी अधूरे वादे और अधूरी इच्छा को पूरा करना था । संवेदनशील पुत्र से संवेदनशील पिता ने एक छोटी सी घटना से रचनात्मक प्रेरणा ली थी । ऐसे में यह समझा जा सकता है कि लम्बे समय तक अपने सृजनशील पिता के साथ रहकर उस संवेदनशील पुत्र ने कितना कुछ ग्रहण किया होगा । दरअसल पिता और पुत्र के बीच संवेदना के स्तर पर जो एक सम्बंध बन गया था वही ‘जीना यहाँ मरना यहाँ’ गीत का अंतरा बन कर अभिव्यक्त हुआ । शैली शैलेन्द्र ने इस गीत में जैसे अपनी सारी सृजनशीलता उड़ेल कर रख दी है । रचनाकार पिता को एक पुत्र की इससे बड़ी श्रद्धांजलि क्या हो सकती थी ! यदि इस गीत को शैलेन्द्र ने पूरा किया होता तो वह कैसा होता यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन यह सोच पाना भी कठिन है कि वह इससे अलग होता !! यह गीत भारतीय दर्शन का निचोड़ लगता है । शैलेन्द्र के ‘सजन रे झूठ मत बोलो’, ‘वहाँ कौन है तेरा मसाफिर जाएगा कहाँ’ जैसे गीत जिस तरह के भावों की अभिव्यक्ति करते हैं शैली शैलेन्द्र ने उसी भाव की परंपरा में एक कालजयी रचना जोड़ने का काम किया है । पिता-पुत्र और आपके बीच में अब मेरी उपस्थिति का कोई मतलब नहीं है । ख़ुद महसूस करिए ।
ये बस्ती है मुर्दापरस्तों की बस्ती !
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| साहिर और गुरूदत्त |
1957 में गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ रिलीज़ हुई थी । इस फिल्म की सफलता में साहिर के गीतों की महत्वपूर्ण भूमिका है । आजादी की खुमारी में चूर उत्साही देशवासियों को आइना दिखाने का काम साहिर ने बड़ी सहजता से कर दिया था । प्यासा में समाज के बदलते चरित्र को बेहद संजीदगी से दर्शा पाने में निर्देशक गुरूदत्त को जो सफलता मिली है, वही सफलता साहिर को अपने गीतों के माध्यम से मिली है । दुनिया पर आत्मकेन्द्रित, स्वार्थी और मौकापरस्त लोगों के लगातार बढ़ते प्रभुत्व को कुछ दृश्यों के सहारे बहुत प्रभावशाली तरीके से फिल्माया गया है । जब सत्ता की आलोचना करके एक बड़ा क्रांतिकारी काम किया जा सकता था, तब गुरूदत्त ने समाज के चरित्र को अपना विषय बनाया । इस सिनेमा में उन्होंने सत्ता की आलोचना के बजाय समाज में बेहतर इंसानों की जरूरत को दर्शा पाने की सफल कोशिश की है । यह सिनेमा जिस लिजलिजे समाज को दिखाता है, वह किसी संवेदनशील व्यक्ति को तोड़ कर रख देने के लिए काफी है । ऐसे में जिस समाज की चिंता करने की जरूरत है, उस समाज में कैंसर की तरह पसर रही आंतरिक विसंगतियों पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है । आज भी समाज की आंतरिक कमजोरियाँ ही एक बेहतर लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं ।
महत्वपूर्ण यह है कि इस सिनेमा के नायक को संवेदनहीन समाज का विकल्प बाजार में धकेल दी गयी एक औरत में मिलता है । नायक इस असलियत से वाकिफ हो चुका होता है कि हम जिसे समाज कह कर उसका हिस्सा बने रहते हैं वह दरअसल असामाजिक लोगों का हुजूम है ।
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| 'प्यासा' में वहीदा और गुरुदत्त |
इसलिए वह दौलत और शोहरत के लोभ में नहीं पड़ता । तंगहाली और ज़िल्लत को लगातार सहते रहने को मजबूर रहे नायक के लिए जब एश-ओ-आराम का अवसर आता है, तब वह उसे ठुकराकर पहचान के लोगों से दूर गुमनाम जिंदगी अपने लिए चुनता है । उस समय उसके साथ बिना सोचे निकल पड़ने वाली लड़की वही होती है जो उसे औरतों के बाज़ार में मिलती है ।
साहित्य से निर्वासित
बचपन से ही कुछ गीत ज़ुबान पर चढ़ गए थे । यह गीत कितने गहन अर्थों और संवेदनाओं को अपने भीतर समेटे हुए हैं यह धीरे-धीरे समझ में आया । ‘नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है’ (बूट पालिश), ‘मेरा जूता है जापानी’ (श्री 420), ‘है प्रीत जहां की रीत सदा’ (उपकार), ‘प्यार किया तो डरना क्या’ (मुगले-आज़म), ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’ (पूरब और पश्चिम) जैसे अनेक गीत मेरे मन और परिवेश में ग़ोया बजते ही रहे हैं । विद्यालयों में गायी जाने वाली ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ (दो आंखें बारह हाथ), ‘हमको मन की शक्ति देना’ (गुड्डी), ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता’ (अंकुश) जैसी प्रार्थनाएं, फिल्मों के ही गीत हैं, यह बहुत बाद में जाकर पता चला ।
साहित्य में मेरी दिलचस्पी की शुरूआत ही सिनेमा के गीतों के माध्यम से हुई थी, यह मेरी दृढ़ मान्यता रही है । लेकिन जब विधिवत रूप से साहित्य अध्ययन में जुटी तब यह जानना निराशाजनक था कि ये गीत साहित्य और साहित्यिक आलोचना की दुनिया में चिर वर्जित रहे हैं । इन गीतों की हिन्दी साहित्य के इतिहासों में एक-आध अपवाद को छोड़ दें तो कहीं चर्चा तक नहीं मिलती है । मतलब साफ है कि सिनेमा के इन गीतों को साहित्य नहीं समझा जाता जबकि ‘गीत’ साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा रहा है । यानि यह समझा और समझाया जाता रहा है कि यदि कोई गीत सिनेमा के लिए नहीं लिखा गया हो तो वह साहित्य है लेकिन सिनेमा का हिस्सा बनते ही वह साहित्य नहीं रह जाता !!
सच तो यह है कि आधुनिक विधाओं में सबसे पहले हिन्दी सिनेमा ने ही प्रभावी ढंग से उथल-पुथल मचाई थी । इसका उल्लेख किया जाना बहुत ज़रूरी है कि परदे के हिमायती समाज में सिनेमा ने औरतों को ‘परदे’ पर ले आने का दुस्साहसिक काम किया था । यह भी अब एक ऐतिहासिक तथ्य बन गया है कि, सिनेमा में तब जब अच्छे घरों की स्त्रियों का आना बहुत कठिन था, तब सिनेमा मे अभिनय की जिम्मेदारी उन खानदानों की औरतों ने उठाई थी जिनकी पीढ़ियाँ बदनाम होकर भी गीत-संगीत और नृत्य को अपने भीतर बचाए हुए थी , आज की नई पीढ़ी के लिए इस तथ्य से ताल-मेल बैठा पाना बहुत कठिन होगा । निश्चित रूप से यह घटना स्त्री मुक्ति के इतिहास में एक बड़ी घटना थी । स्त्रियों के सिनेमा में आगमन से पुरुष-सत्ता को जो चुनौती मिली थी उस चुनौती को स्वीकार नहीं करना पौरूष के खिलाफ था । पुरूषों के पास एक सदियों से आजमाया हथियार है और वह यहाँ भी अपनाया गया । माने यह कि सिनेमा की दुनिया एक बदनाम दुनिया की तरह प्रचारित की जाने लगी और यह हथियार यहाँ भी अचूक साबित हुआ । यह कहना ग़लत नहीं होगा कि साहित्य की दुनिया में हिन्दी सिनेमा के गीतों की उपेक्षा किये जाने का सबसे बड़ा कारण सिनेमा की दुनिया के प्रति घृणा का भाव रखना रहा है । सिनेमा के व्यावसायिक स्वाभाव के कारण भी सिनेमा को दोयम दर्जे का समझा गया । भवानी प्रसाद मिश्र ने जब आर्थिक जरूरतों के लिए सिनेमा में कुछ गीत लिखे थे तो उनकी बहुत फजीहत हुई थी । उनकी इस पीड़ा को उनकी कविता- ‘गीत फ़रोश’ में महसूस किया जा सकता है । ‘जी हाँ हुजूर मैं गीत बेचता हूँ ’ कहता हुआ कवि दरअसल एक जड़ साहित्यिक समाज पर व्यंग्य भी कर रहा है । दुखद यह रहा कि हिन्दी की प्रगतिशील आलोचना ने भी हिन्दी सिनेमा के गीतों की घोर उपेक्षा की है , और उनकी ताक़त को पहचानने में भारी भूल की है । आज भी सिनेमा के गीतों की पहुँच समाज के जिस निचले तबक़े तक आसानी से हो जाती है तथाकथित साहित्यिक रचनाओं के लिए वह सपने जैसा है ।
हिन्दी सिनेमा के गीतों के साहित्यिक महत्व पर मैंने एम.फिल. शोधकार्य किया है । हिन्दी विभागों में इस तरह के शोध प्रस्तावों को स्वीकृति मिलने में जो कठिनाइयाँ आती हैं, वह अलग से एक शोध का विषय है । फ़िलहाल शोध कार्य पूरा हो चुका है । जब कभी मन में आएगा इस विषय पर लिखती रहूँगी । हिन्दी सिनेमा के गीतों की यात्रा , उनके साहित्यिक महत्व और गीतकारों के रचनात्मक संघर्षों पर बात करते हुए जब-तब यहाँ हाज़िर हो जाउंगी । बहरहाल इस एक गीत को सुनिए और सोचिए कि अब तक आपका जिन महत्वपूर्ण पद्य रचनाओं से परिचय रहा है उनसे इसका महत्व क्या रत्ती भर भी कम है !!
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