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| साहिर और गुरूदत्त |
1957 में गुरुदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ रिलीज़ हुई थी । इस फिल्म की सफलता में साहिर के गीतों की महत्वपूर्ण भूमिका है । आजादी की खुमारी में चूर उत्साही देशवासियों को आइना दिखाने का काम साहिर ने बड़ी सहजता से कर दिया था । प्यासा में समाज के बदलते चरित्र को बेहद संजीदगी से दर्शा पाने में निर्देशक गुरूदत्त को जो सफलता मिली है, वही सफलता साहिर को अपने गीतों के माध्यम से मिली है । दुनिया पर आत्मकेन्द्रित, स्वार्थी और मौकापरस्त लोगों के लगातार बढ़ते प्रभुत्व को कुछ दृश्यों के सहारे बहुत प्रभावशाली तरीके से फिल्माया गया है । जब सत्ता की आलोचना करके एक बड़ा क्रांतिकारी काम किया जा सकता था, तब गुरूदत्त ने समाज के चरित्र को अपना विषय बनाया । इस सिनेमा में उन्होंने सत्ता की आलोचना के बजाय समाज में बेहतर इंसानों की जरूरत को दर्शा पाने की सफल कोशिश की है । यह सिनेमा जिस लिजलिजे समाज को दिखाता है, वह किसी संवेदनशील व्यक्ति को तोड़ कर रख देने के लिए काफी है । ऐसे में जिस समाज की चिंता करने की जरूरत है, उस समाज में कैंसर की तरह पसर रही आंतरिक विसंगतियों पर ध्यान देना भी उतना ही जरूरी है । आज भी समाज की आंतरिक कमजोरियाँ ही एक बेहतर लोकतांत्रिक व्यवस्था के निर्माण की सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं ।
महत्वपूर्ण यह है कि इस सिनेमा के नायक को संवेदनहीन समाज का विकल्प बाजार में धकेल दी गयी एक औरत में मिलता है । नायक इस असलियत से वाकिफ हो चुका होता है कि हम जिसे समाज कह कर उसका हिस्सा बने रहते हैं वह दरअसल असामाजिक लोगों का हुजूम है ।
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| 'प्यासा' में वहीदा और गुरुदत्त |
इसलिए वह दौलत और शोहरत के लोभ में नहीं पड़ता । तंगहाली और ज़िल्लत को लगातार सहते रहने को मजबूर रहे नायक के लिए जब एश-ओ-आराम का अवसर आता है, तब वह उसे ठुकराकर पहचान के लोगों से दूर गुमनाम जिंदगी अपने लिए चुनता है । उस समय उसके साथ बिना सोचे निकल पड़ने वाली लड़की वही होती है जो उसे औरतों के बाज़ार में मिलती है ।


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